A beautiful Ghazal sung by Ghulam Ali : फासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था, सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा ना था। वो की खुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू, मैं उसे महसूस कर सकता था, छु सकता न था।
इस क़दर तोडा है मुझे उस की बे-वफाई ने "ग़ालिब" अब कोई अगर प्यार से भी देखे तो बिखर् जाता हूँ मै। ***************************** Iss kadar toda hai mujhe uski bewafai ne Gaalib, Ab koi agar pyar se bhi dekhe to bikhar jaata hoon main...
कुछ तबियत ही मिली थी ऐसी, चैन से जीने की सूरत न हुई, जिस को चाहा उसे अपना न सके, जो मिला उस से मोहब्बत न हुई। जिस से जब तक मिले दिल ही से मिले, दिल जो बदला तो फ़साना बदला, रस्मे दुनिया की निभाने के लिए, हमसे रिश्तो की तिजारत न हुई।